देशभक्ति: एक विवशता?

सोमवार को जारी अधिसूचना में कहा गया है कि गुजरात के स्कूलों में छात्र 1 जनवरी 2019 से, वर्तमान 'यस सर' और 'सर' की जगह, 'जय हिंद' या 'जय भारत' के साथ रोल कॉल का जवाब देंगे। इस विचार के पीछे उद्देश्य का अनुमान लगाना उतना कठिन नहीं है। इस नई प्रथा के पीछे का उद्देश्य यह है कि बचपन से छात्रों के हृदय में देशभक्ति को बढ़ावा देना है। देशभक्ति का आह्वान करने की एक और घटना यह थी कि हाल ही में सिनेमा हॉल में लोगों को फिल्म शुरू होने से पहले राष्ट्रगान के लिए खड़े होने के लिए मजबूर किया गया था। इससे जुड़ी एक चौंकाने वाली घटना सामने आई जब गुवाहाटी के एक मल्टीप्लेक्स में राष्ट्रगान के दौरान खड़े नहीं होने के कारण एक दिव्यांग व्यक्ति के साथ दुर्व्यवहार किया गया। ऐसी घटनाओं का समाज पर क्या प्रभाव पड़ता है? इन घटनाओं के नतीजे क्या हैं? क्या इस तरह के नियमों को लागू करना वास्तव में किसी के दिल में देशभक्ति की भावना पैदा कर सकता है?

इस तरह के नियमों के जबरदस्त प्रभाव हवा में स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा हैं। यह लोगों में सहिष्णुता के वास्तविक सार को समाप्त कर रहा है। लोग राष्ट्र के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे है। गैर-सहिष्णुता की भावना लोगों के दिल में आ गई है। लोगो में अलग राष्ट्र और अलग नियम की चाहत बढ़ गयी है। एकता की असली जड़ें ढीली हो गई है। भारत की एकता और अखंडता में दरार साफ़ तौर पर देखी जा सकती है। अब्राहम लिंकन ने लोकतंत्र को इस रूप में परिभाषित किया कि “लोगों की सरकार, लोगों के द्वारा और लोगों के लिए है”। लोगों की इच्छा के खिलाफ कुछ नियमों को लागू करना, क्या यह वास्तव में लोकतंत्र का सही सार है? क्या हमने लोकतंत्र की परिभाषा नहीं खोई है? फिर तानाशाही और लोकतंत्र में क्या अंतर बचा है? क्या उन दोनों को अलग करने वाली उस पतली रेखा तक हम नहीं पहुंचे गये जो की कभी भी टूट सकती है? हमारे नेताओं और स्वतंत्रता सेनानियों ने कभी अपने सबसे डरावने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि भारत एक दिन वैसा हो जाएगा जैसा वो आज है। क्या यह शर्मनाक नहीं है?

सरकार का ध्यान केवल अपने नागरिकों के कल्याण पर होना चाहिए। यह कल्याण के अपने उद्देश्य को देशभक्ति से ना बदले। क्या सबका 'जय हिंद' कहना उनके जीवन-स्तर में वृद्धि करेगा? अगर जवाब 'नहीं' है तो किसी का 'जय हिंद' ना कहना भी किसी की हानि तो नहीं करेगा। कोई भी व्यक्ति कैसे देश को प्यार करेगा ऐसा देश जहा हर कोई 'वंदे मातरम’ का जाप करता है या ऐसा जहाँ कोई गरीब नहीं है? यदि कोई अपनी दिल से 'भारत माता की जय' कहना चाहता है तो ऐसा करने के लिए वह स्वतंत्र होना चाहिए और यदि कोई ऐसा नहीं करना चाहता है तो उसे भी ऐसा करने के लिए समान रूप से स्वत्रंता होनी चाहिए। क्या हमारे भारत का संविधान की प्रस्तावना ने हमें विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, और पूजा की स्वत्रंता का वादा नहीं किया है? फिर, विचारो की स्वतंत्रता का अधिकार छीनने वाली सरकार या कोई अतिवादी कौन होता है? देशभक्ति भीतर से आती है। यहां तक कि अगर हम कुछ शब्दों का उच्चारण नहीं करते हैं, लेकिन अपने देश से प्यार करते हैं और उसका सम्मान करते हैं, तो ऐसा करने वाले लोग उन लोगों से समान रूप से या उससे भी अधिक देशभक्त होते है। मुझे अपनी माँ को रोज़ यह बताने की ज़रूरत नहीं है कि मैं उससे प्यार करती हूँ लेकिन मेरा काम उन्हें यह ज़रूर दिखा देगा कि मैं वास्तव में ऐसा करती हूँ या नहीं। क्या हमारा देश हमारी माँ के समान नहीं है?

-आस्था सिंह